Tuesday, January 30, 2007

कोई बात चले

सध्या गाडीत वाजतीये गुलज़ार-जगजित ची "कोई बात चले". "बात" कुछ तो ज़रूर है! पण "मरासिम" नंतर या अल्बमने अपेक्षाभंग केला असं नाही म्हणलं, तरी अपेक्षापूर्ती नक्कीच केली नाही. गुलज़ारच्या शब्दांपेक्षा जगजितच्या सुरांबाबत जास्त!

बाकी तर ऐकून ऐकून चढतीलच काही त्रिवेणी, पण पहिल्यांदाच ऐकून ही रुतून बसलीये, अगदी typical गुलज़ार!

उड के जाते हुए पंछी ने बस इतनाही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही वोह शाख फिज़ा में
अलविदा कहती थी या पास बुलाती थी उसे?

अजून एक नोंदल्याशिवाय राहवत नाही:

उम्र के खेल में एकतर्फा है ये रस्साकशी
एक सिरा मुझको दिया होता तो कुछ बात भी थी
मुझसे तगडा भी है और सामने आता भी नहीं

4 comments:

Tulip said...

wowww sahi!!
marasim pahilya aikanyatach avadun jate g. koi baat chale jara 'chadhayala' vel lagato. next time aikalis ki jast avadel:)

वैभव जोशी said...

same same.
gaaDit sadhyaa phakta koi baat chale. :-)
kadhitari jagjit gulzar chyaa shabdaanna nyaay deil ashyaa aashene aani jau de to naahi tar naahi pan gulzar chyaa aavaajaatlyaa 5-10 oLee kadhi yetaat evaDhyaasaathi . how about

हमको गालिब ने यह दुवा दी थी
तुम सलामत रहो हजार बरस

यह बरस तो फ़कत दिनों में गया

Sumedha said...
This comment has been removed by the author.
Monsieur K said...

havent heard "koi baat chale' yet, but i liked the lines u have mentioned.
you look back at the places you leave, and wonder if they are calling you back or is it a final goodbye. :)
~ Ketan